देवल संवाददाता, मऊ।सावन मास की पहचान माने जाने वाले कजरी गीत अब गावों और शहरों में पहले की तरह सुनाई नहीं दे रहे हैं। एक दौर था जब सावन के शुरू होते ही बारिश की फुहारों संग पेड़ों पर झूले व कजरी का मिठास पूरे वातावरण में घुल जाया करती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। सावन बीतने को है,लेकिन न कहीं झूला और न ही कहीं कजरी के बोल ही सुनाई पड़ रहे हैं। परंपराएं धीरे धीरे लुप्त होती जा रही हैं।महुआ,सुर संग्राम जिला टॉप लोक गायिका सोनी सिन्हा ने कहा कि कजरी केवल एक गीत नहीं,बल्कि सावन के उल्लास, विरह और लोक संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है। परंपराएं और उनकी पहचान आज न पेड़ों पर झूले दिखाई देते हैं और न ही गलियों,चौपालों व खेत-खलिहानों में कजरी की गूंज सुनाई देती है। एक समय था जब गांव के आम,नीम और जामुन के पेड़ों पर रस्सियों के मजबूत झूले बांधे जाते थे। सावन भर बच्चे,किशोरियां और महिलाएं झूला झूलने पहुंचती थीं। झूले के साथ कजरी गायन की परंपरा भी पूरे शबाब पर रहती थी। अब इन पेड़ों के नीचे सन्नाटा पसरा रहता है। बच्चों का बचपन भी अब मोबाइल फोन और डिजिटल गेम तक सिमट गया है। लोक परंपराओं की जगह आधुनिक मनोरंजन के साधनों ने ले ली है।रिकर्डिंग तक सिमट गई कजरी की परंपरा,पूर्वांचल में सावन को कभी कजरी का महीना कहा जाता था। कहत गिरीजा गनराज और बरसन लागी सावन की बदरिया सावन जैसे लोकगीत गांव-गांव में गूंजते थे। महिलाएं झूला झूलते हुए,खेतों में काम करते समय और सामूहिक आयोजनों में कजरी गाकर सावन का स्वागत करती थीं। अब यह लोकसंगीत रेडियो,यूट्यूब और सांस्कृतिक मंचों तक सीमित होकर रह गया है। चौपालों और आंगनों से इसका रिश्ता लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है,जिससे पूर्वांचल की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत भी धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है।क्षेत्र के लुदुही निवासी 55 वर्षीय शिक्षक कांति देवी ने बताया कि पहले गांव की लड़कियां सावन का इंतजार करती थीं। भोजपुरी में बात करते हुए कहा कि सावन के आवते हर घर में झूला डाल के नया नया कनिया संगे गांव के लईकी सब झूला झूलत कजरी के गीत सब गावत वत रहली, जवन बड़ा निक लागत रहे। कजरी में पिया मेंहदी मंगा द मोती झील से,जाई के साइकिल से ना,पिया मेंहदी मंगा द,छोटकी ननदी से पिसा द,हमरा हथवा पर चढ़ा द,कांटा कील से,हरि हरि बाबा के दुवरिया मोरवा बोले ए हरि आदि काफी प्रचलित रही। कजरी गीत नई नवेली दुल्हन गांव की लड़कियां गाकर हास्य परिहास के साथ मनोरंजन किया करती थी।यही नहीं खेतों में सोहनी के समय महिला मजदूर भी कजरी गीत गाकर सावन का जश्न मनाती थीं। लेकिन आज झूला और कजरी बीते जमाने की बात हो गई है। ननंद भौजाई का रिश्ता नदी के दो पाटों की तरह हो गए हैं। इंदारा गांव निवासी संतोष पाण्डेय ने बताया कि पहले प्रेम घर में ही नहीं आस पड़ोस में भी था। टोला भर की लड़कियां एक जगह इकट्ठा होकर कजरी गायन करती थीं। लेकिन आज प्रेम का अभाव साफ दिखता है। डॉ प्रीति का कहना है कि समय के अभाव के चलते कजरी गीत तो दूर कई घरेलू परंपराएं दूर होती जा रही हैं। पहले संयुक्त परिवार था एक परिवार में 10 लोग थे सब लोग एक जगह मिल बैठकर बातों बातों में ही हास परिहास शुरू कर देते थे पर आज संयुक्त परिवार टूटता जा रहा है और एकांकी परिवार लोक परंपराओं को निभाने का समय ही नहीं दे पाता। पहले भारतीय शिक्षा पद्धति के अनुसार पढ़ाई होती थी अब अंग्रेजी की पढ़ाई हो रही है। विभिन्न तरह के काम से फुर्सत ही नहीं मिलती। कजरी के लिए अब गांवों में माहौल ही नहीं रहता है।
