तेजस फाइटर प्रोग्राम से बाहर किए जाने के लगभग 18 साल बाद भारत के स्वदेशी कावेरी जेट इंजन प्रोजेक्ट में फिर से जान आ गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा DRDO के वैज्ञानिकों को अगले पांच से सात वर्षों के भीतर छठी पीढ़ी के फाइटर इंजन विकसित करने का लक्ष्य देने की है, हाल ही में कावेरी इंजन के सफल आफ्टरबर्नर परीक्षण और सैन्य विमानन में आत्मनिर्भरता की सरकार की नई पहल ने इस लंबे समय से लंबित कार्यक्रम को फिर से चर्चा में ला दिया है।
भले ही मूल GTX-35VS कावेरी इंजन तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के लिए भारतीय वायु सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहा हो, लेकिन तीन दशकों में विकसित की गई तकनीकें अब एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, घातक स्टेल्थ मानव रहित लड़ाकू विमान और मरीन गैस टर्बाइन जैसे भविष्य के रक्षा कार्यक्रमों की नींव रख रही हैं।
रक्षा मंत्री का महत्वाकांक्षी लक्ष्य
इस साल फरवरी में बेंगलुरु स्थित DRDO के गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट के दौरे के दौरान, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वैज्ञानिकों से दशकों के एयरो-इंजन विकास को बहुत कम समय-सीमा में समेटने का आग्रह किया।
उन्नत देशों को नए फाइटर इंजन विकसित करने में 25 से 30 साल लगते हैं, इसका जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हमें यह मानकर चलना चाहिए कि 20 साल बीत चुके हैं और अब हमारे पास केवल 5-7 साल बचे हैं।
उन्होंने 5वीं पीढ़ी के इंजन से आगे बढ़कर छठी पीढ़ी के इंजन पर काम शुरू करने का आह्वान किया, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और नई सामग्रियों का उपयोग हो। इस दौरान उन्होंने कावेरी इंजन का एक सफल फुल-आफ्टरबर्नर परीक्षण भी देखा।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सहयोग से विकसित इस अपग्रेडेड कॉन्फिगरेशन का लक्ष्य लगभग 81-83 किलोन्यूटन थ्रस्ट उत्पन्न करना है, जो इसे भविष्य के लड़ाकू विमानों की जरूरतों के करीब लाता है।
कावेरी इंजन की चुनौतियां
भारत ने 1989 में तेजस फाइटर के लिए एक स्वदेशी आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन विकसित करने के लिए कावेरी इंजन कार्यक्रम को मंजूरी दी थी। GTRE के नेतृत्व में यह प्रोजेक्ट 382 करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुआ था और इसे आठ साल से कम समय में पूरा होने की उम्मीद थी।
हालांकि, तकनीकी चुनौतियों के कारण इंजन वायु सेना की परिचालन आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सका। तेजस के लिए 83-85 kN थ्रस्ट की आवश्यकता थी, जबकि यह केवल 70-72 kN थ्रस्ट ही उत्पन्न कर पाया। यह अपने डिजाइन लक्ष्य से 150 किलो भारी भी था और इसके टर्बाइन ब्लेड व इंजन कंट्रोल सिस्टम में कई तकनीकी कमियां थीं।
1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भारत में हाई-ऑल्टिट्यूड इंजन परीक्षण सुविधा की कमी ने भी इस परियोजना को बाधित किया। अंततः 2008 में कावेरी को आधिकारिक तौर पर तेजस कार्यक्रम से अलग कर दिया गया।
विदेशी इंजनों पर भारत की निर्भरता
दशकों के स्वदेशी निवेश के बावजूद, भारत का फ्रंटलाइन फाइटर बेड़ा आज भी अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के इंजनों पर निर्भर है। तेजस Mk-1 और Mk-1A में GE F404-IN20 इंजन का उपयोग होता है, जबकि तेजस Mk-2 और AMCA के शुरुआती प्रोटोटाइप के लिए अधिक शक्तिशाली F414 इंजन चुना गया है।
यह निर्भरता केवल लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं है। भारतीय नौसेना के P-8I समुद्री गश्ती विमान, MH-60R हेलीकॉप्टर और वायु सेना के अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर भी GE पावरप्लांट का उपयोग करते हैं।
समुद्र में, INS विक्रांत और शिवालिक श्रेणी के युद्धपोतों के लिए LM2500 मरीन गैस टर्बाइन का इस्तेमाल किया जा रहा है। हाल ही में F404 इंजनों की डिलीवरी में एक साल से अधिक की देरी के कारण HAL को विमान उत्पादन धीमा करना पड़ा, जिससे विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता के जोखिमों को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया।
AMCA भविष्य की उम्मीदें
कावेरी कार्यक्रम को मिली नई गति भारत के 5वीं पीढ़ी के AMCA यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट विमान विकसित करने की योजना के साथ मजबूती से जुड़ती है। हालांकि AMCA के पहले कुछ प्रोटोटाइप GE F414 इंजनों के साथ उड़ान भरेंगे, लेकिन दीर्घकालिक उद्देश्य इसे पूरी तरह से स्वदेशी इंजन से लैस करना है।
इस प्रयास को गति देने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय एयरो इंजन मिशन शुरू किया है। इस पहल का उद्देश्य आधुनिक फाइटर इंजन विकसित करने के लिए भारतीय उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और विदेशी प्रौद्योगिकी भागीदारों को एक साथ लाना है।
भले ही मूल कावेरी इंजन अब सीधे तौर पर तेजस लड़ाकू विमानों को शक्ति न दे, लेकिन इसके तहत प्राप्त की गई धातु विज्ञान, डिजिटल इंजन कंट्रोल और टर्बाइन डिजाइन की स्वदेशी क्षमताएं भारत के अगले जनरेशन के सैन्य इंजनों की मजबूत नींव बन चुकी हैं।
