डिजिटल धार्मिक पर्यटन प्रणाली का जर्मन पेटेंट कार्यालय में पंजीकरण,डॉ. वंदना गिरी एवं डॉ.अर्पिता मिश्रा को मिली अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि
देवल संवाददाता, आजमगढ़, 22 जुलाई। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय (एमएसडीयू), आजमगढ़ की दो शिक्षिकाओं *डॉ. वंदना गिरी एवं डॉ. अर्पिता मिश्रा* ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय और देश का गौरव बढ़ाया है। धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में विकसित एक अभिनव डिजिटल तकनीक को जर्मनी के पेटेंट एवं ट्रेडमार्क कार्यालय (German Patent and Trade Mark Office–DPMA) द्वारा उपयोगिता मॉडल (Utility Model) के रूप में पंजीकृत किया गया है। इस शोध उपलब्धि में एमएसडीयू की दोनों शिक्षिकाएं सह-अन्वेषक (Co-Inventors) के रूप में शामिल हैं।
जर्मन पेटेंट कार्यालय द्वारा जारी प्रमाण-पत्र के अनुसार उपयोगिता मॉडल संख्या 20 2026 101 610 के अंतर्गत पंजीकृत इस तकनीक का शीर्षक "धार्मिक पर्यटन के विकास हेतु डिजिटल प्रस्तुतीकरण, पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण एवं विकास में तेजी लाने वाली प्रणाली" है। यह नवाचार आधुनिक डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण के माध्यम से धार्मिक पर्यटन स्थलों के प्रबंधन, पर्यटकों की आवश्यकताओं के आकलन तथा पर्यटन विकास की योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक होगा।
इस शोध परियोजना में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों के शोधकर्ताओं एवं शिक्षाविदों ने सहभागिता की है। शोध दल में प्रतीक अग्रवाल, प्रणव भार्गव, देवेंद्र कुमार भट्ट, डॉ. सुधीर कुमार द्विवेदी, डॉ. वंदना गिरी, मेधा जायसवाल, डॉ. अर्पिता मिश्रा, पूनम पुरी, जयकिशन पुरोहित तथा अपर्णा राज शामिल हैं। इस सामूहिक शोध कार्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली मान्यता भारतीय शोध एवं नवाचार क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जा रही है।
प्रमाण-पत्र के अनुसार इस उपयोगिता मॉडल के लिए 23 मार्च 2026 को आवेदन किया गया था, जबकि 3 जुलाई 2026 को जर्मनी के पेटेंट एवं ट्रेडमार्क कार्यालय ने इसका औपचारिक पंजीकरण प्रदान किया। प्रमाण-पत्र जर्मन पेटेंट एवं ट्रेडमार्क कार्यालय की अध्यक्ष ईवा शेवियर के हस्ताक्षर से जारी किया गया है।
*विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो .संजीव कुमार* ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सफलता न केवल एमएसडीयू बल्कि पूरे प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने डॉ. वंदना गिरी और डॉ. अर्पिता मिश्रा को बधाई देते हुए विश्वास जताया कि उनकी यह उपलब्धि विश्वविद्यालय में शोध, नवाचार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई दिशा प्रदान करेगी।यह तकनीक भविष्य में स्मार्ट टूरिज्म, डिजिटल पर्यटन प्रबंधन, नीति निर्माण, डेटा आधारित निर्णय प्रक्रिया तथा धार्मिक पर्यटन के सतत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उनका मानना है कि इस प्रकार के नवाचार भारत की शोध क्षमता को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध होंगे।

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