प्यार करो, अपने बूढ़े मां बाप का की उम्मीद पर पानी मत फेरो दुनिया बहुत खूबसूरत है
कृष्ण, देवल ब्यूरो, अंबेडकर नगर । सम्मनपुर, बसखारी, राजेसुल्तानपुर, कटका, हंसवर… इन नामों को सुनकर अब अभिभावकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बीते छह महीनों में यहां जो कुछ हो रहा है, वो न प्रेम कहानी है, न सोशल मीडिया की "क्यूट" वाली रील… बल्कि एक खतरनाक सिलसिला है जिसमें किशोर-किशोरियां मोबाइल की चमक में खोकर, छोटी-सी नाराजगी को जहर और फंदे में बदल रही हैं।प्रेमी युगल भावुक होकर खुदकुशी, प्रेमिका की हत्या कर खुद जहर पीना, सुनसान बाग में पेड़ से लटकती लाशें, और "एक फूल दो माली" वाली अफेयर्स का खूनी अंजाम। उम्र? ज्यादातर 15 से 25 साल। यानी वो उम्र जब हॉर्मोन उफान पर होते हैं और दिमाग अभी ब्रेक लगाना सीख ही नहीं पाया।रात के 2 बजे तक "बेबी, I love you" वाली चैटिंग, इंस्टा-रील्स पर परफेक्ट कपल देखकर अपनी जिंदगी को फेल समझना, और परिवार से एक सवाल पूछने पर "Privacy!" चिल्लाना… ये नया नॉर्मल बन गया है। पहले लड़का-लड़की की बातचीत पर पूरा मोहल्ला जुट जाता था। अब? पूरा मोहल्ला जुटता है जब शव मिलता है। मोबाइल ने तो कमाल कर दिया — 10वीं पास लड़की को लगता है वो शाहरुख खान की हीरोइन है, और लड़का सोचता है सलमान का स्टाइल है उसमें। थोड़ी नाराजगी हुई,ब्लॉक-आनब्लॉक का ड्रामा, और फिर "मैं मर जाऊंगा/जाऊंगी" वाला सीन। असल जिंदगी में री-टेक नहीं होता भाई!"बेटा पढ़ लो, 95% लाना है" — बस यही डायलॉग। बाकी समय? बच्चा अपने कमरे में, हेडफोन लगाए, दूसरी दुनिया में। मां-बाप को पता भी नहीं चलता कि उनका लाड़ला किस "प्रिया" से बात कर रहा है, या लाड़ली किस "राहुल" के साथ "फॉरएवर" का वादा कर रही है।जब बच्चा चुप हो जाए, मोबाइल पर घंटों खो जाए, और परिवार से दूरी बनाने लगे — तभी खतरे की घंटी बजनी चाहिए। लेकिन ज्यादातर मां-बाप तब तक इंतजार करते हैं जब तक पुलिस वाले दरवाजा खटखटाते नहीं।
अम्बेडकरनगर की ये घटनाएं सिर्फ एक जिले की नहीं, पूरे देश की कहानी बनती जा रही हैं। मोबाइल की रोशनी में अंधेरे में जा रहे हमारे बच्चे अगर आज नहीं संभले तो कल पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचेगा।
