कृष्ण, देवल ब्यूरो, अंबेडकर नगर ।अम्बेडकरनगर जनपद के जहांगीरगंज क्षेत्र स्थित लखंडीह गांव में संचालित जय निषाद राज इंडस्ट्रीज (मत्स्य आहार परियोजना) से जुड़ा विवाद अब केवल एक औद्योगिक इकाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी अनुदान, विभागीय निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। परियोजना में स्थापित फिश फीड निर्माण मशीन की क्षमता और लागत को लेकर उठे आरोपों ने पूरे मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
मामले में आरोप लगाया जा रहा है कि परियोजना में लगाई गई फिश फीड निर्माण मशीन की वास्तविक उत्पादन क्षमता लगभग 4 टन प्रतिदिन है, जबकि विभागीय अभिलेखों में उसे 20 टन क्षमता का दर्शाया गया है। इतना ही नहीं, मशीन की कीमत को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि जिस मशीन की बाजार कीमत लगभग 31.92 लाख रुपये बताई जा रही है, उसी को सरकारी अभिलेखों में 65.52 लाख रुपये की लागत का दर्शाया गया है।
यदि शिकायतकर्ताओं के दावों में तथ्य पाए जाते हैं, तो यह केवल क्षमता के अंतर का मामला नहीं होगा, बल्कि परियोजना स्वीकृति, मूल्यांकन और अनुदान वितरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी अनुदान आधारित परियोजना में मशीन की क्षमता और लागत ही वित्तीय स्वीकृति का प्रमुख आधार होती है। ऐसे में यदि अभिलेखों और वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर पाया जाता है, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
प्रकाशन के बाद बढ़ा विवाद
मामले को लेकर समाचार प्रकाशित होने के बाद विवाद और गहरा गया है। खोजी मीडिया से जुड़े लोगों का आरोप है कि समाचार प्रकाशित होने के बाद कुछ व्यक्तियों द्वारा उनके कार्यों को प्रभावित करने तथा दबाव बनाने का प्रयास किया गया। उनका कहना है कि उनके पास इस संबंध में ऑडियो और वीडियो साक्ष्य उपलब्ध हैं।
हालांकि दूसरी ओर कुछ लोगों द्वारा खोजी मीडिया पर भी विभिन्न प्रकार के आरोप लगाए गए हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोपों के बीच वास्तविक स्थिति क्या है, इसका निर्धारण केवल सक्षम प्रशासनिक जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही संभव होगा।
धरातल और दस्तावेजों की पड़ताल की मांग
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि पूरे मामले की तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए, जिसमें मशीन की वास्तविक क्षमता, क्रय मूल्य, आपूर्तिकर्ता द्वारा जारी बिल, भुगतान प्रक्रिया और अनुदान वितरण के दस्तावेजों का सत्यापन कराया जाए। उनका तर्क है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है तो जांच से सभी संदेह स्वतः समाप्त हो जाएंगे, लेकिन यदि अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।
अधिकारियों से सत्यापन की मांग
जानकारी के अनुसार, मामले को लेकर संबंधित अधिकारियों से मशीन की क्षमता और बिलों के सत्यापन की मांग की गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने विभागीय अधिकारियों को उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर जांच की मांग की है। अधिकारियों द्वारा मामले की जांच कर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने की बात भी सामने आई है।
प्रशासन की निष्पक्षता पर टिकी निगाहें
वर्तमान में यह मामला अंबेडकरनगर प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। कारण यह है कि मामला सरकारी अनुदान, विभागीय अनुमोदन और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ा हुआ है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं होगा, बल्कि सरकारी योजनाओं के उद्देश्य और जनहित के साथ भी गंभीर खिलवाड़ माना जाएगा।
वहीं यदि जांच में आरोप निराधार पाए जाते हैं, तो इससे संबंधित पक्षों की स्थिति भी स्पष्ट हो जाएगी। इसलिए स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि मामले की जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से कराई जाए ताकि तथ्य सामने आ सकें और किसी भी प्रकार की भ्रम की स्थिति समाप्त हो।
फिलहाल पूरे मामले पर क्षेत्रवासियों, मत्स्य पालन से जुड़े लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों की नजरें टिकी हुई हैं। अब देखना यह होगा कि जांच प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है और प्रशासन आरोपों की सच्चाई तक पहुंचने के लिए क्या कदम उठाता है।
