जुलूस रेलवे स्टेशन के उत्तरी छोर से शुरू होकर टाउन चौराहे तक गया। प्रदर्शनकारी शिक्षकों और कर्मचारियों ने एक स्वर में कहा कि यह लड़ाई उनके अस्तित्व से जुड़ी है और वे इसे संसद से सड़क तक लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के 1 सितंबर 2025 के उस आदेश का विरोध किया, जिसमें आरटीई (शिक्षा का अधिकार) अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त और टेट से छूट प्राप्त शिक्षकों के लिए टेट को अनिवार्य किया गया है। संगठनों का कहना है कि यह आदेश पूर्व स्थापित शिक्षक भर्ती नियमों और परंपराओं के विपरीत है।
शिक्षकों ने आरोप लगाया कि इस आदेश पर सरकार की चुप्पी के कारण वर्ष 2011 से पहले नियुक्त लाखों शिक्षकों और उनके परिवारों के साथ-साथ छात्रों का भविष्य भी खतरे में पड़ गया है। उन्होंने सरकार से इस "तुगलकी आदेश" को शिक्षक और राष्ट्र हित में निरस्त करने के लिए सार्थक पहल करने की मांग की। सभी प्रतिनिधियों ने बलिया से निरंतर संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया।
इस मशाल जुलूस में अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ, अटेवा, प्राथमिक शिक्षक संघ, टीएससीटी, विशिष्ट बीटीसी, आरएसएम, राज्य कर्मचारी संघ, श्रमिक समन्वय समिति, विकास भवन संघ, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद, एकजुट और रसोइया संघ सहित विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी और सदस्य शामिल हुए। इनमें समीर कुमार पाण्डेय, अजय कुमार सिंह, विनय राय, सतीश सिंह, घनश्याम चौबे, राजेश सिंह, राजेश पाण्डेय, अविनाश उपाध्याय, सुशील त्रिपाठी, संजीव कुमार सिंह (मीडिया प्रभारी), अभिषेक राय, राकेश कुमार मौर्य, मलय पाण्डेय (महामंत्री राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद), संजय पाण्डेय, राजीव कुमार गुप्ता, लाल साहब यादव, रेणु शर्मा (अध्यक्ष रसोइया संघ), विमला भारती (मंत्री) और अन्य कई शिक्षक व कर्मचारी मौजूद थे।
