देवल, ब्यूरो चीफ, सोनभद्र ।आज 14 अप्रैल 2026 को भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती सुकृत रेंज कार्यालय पर मनाई गई,आधुनिक भारत के निर्माता और भारतीय संविधान के जनक के रूप में बाबा साहब को याद करते हुए क्षेत्रीय वनाधिकारी श्री हिमांशु कुमार ने बताया कि जिस बच्चे को क्लास में टाट पर भी कोने में बैठाया गया, जिस बच्चे को स्कूल का मटका छूने नहीं दिया गया, उसी बच्चे ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डिग्री लेकर दुनिया को बता दिया: "ज्ञान किसी जाति की बपौती नहीं"। अपमान को उन्होंने आंसू नहीं, आग बनाया। और उस आग से लाखों घरों में पढ़ाई के दिए जले।
बाबासाहेब ने जीवन में तीन मोर्चे एक साथ लड़े:
सामाजिक : महाड़ सत्याग्रह से पानी का हक, नासिक के कालाराम मंदिर से पूजा का हक।
राजनीतिक: गोलमेज सम्मेलन में बैठकर बताया कि 6 करोड़ अछूत कोई दया नहीं, हिस्सेदारी मांगते हैं।
कानूनी: संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनकर हर भारतीय को "हम भारत के लोग" बना दिया।
वो सिर्फ दलितों के नेता नहीं थे। वो मजदूर के लिए 8 घंटे काम, महिला के लिए संपत्ति का हक, किसान के लिए रिजर्व बैंक का विचार देने वाले आधुनिक भारत के असली वास्तुकार थे।
26 नवंबर 1949: सबसे बड़ी क्रांति
जब बाबासाहेब ने संविधान सभा में संविधान सौंपा तो कहा था: "हम एक विरोधाभासी जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में बराबरी होगी, पर सामाजिक-आर्थिक जीवन में गैर-बराबरी रहेगी। जब तक इस विरोधाभास को खत्म नहीं करते, लोकतंत्र खतरे में रहेगा"।
साथियों, इतने दशकों बाद भी बाबासाहेब का ये सवाल हमारे दरवाजे पर खड़ा है।
आज की जयंती, आज का संकल्प
फूल-माला, नारे और DJ से जयंती पूरी नहीं होती। बाबासाहेब को सच्ची श्रद्धांजलि क्या होगी?
शिक्षित बनो: अपने घर का एक बच्चा भी स्कूल न छोड़े। डिग्री सिर्फ नौकरी के लिए नहीं, सवाल पूछने की ताकत के लिए लो।
संगठित रहो: टुकड़ों में बंटकर हम भीड़ हैं, एक होकर ताकत।
संघर्ष करो: लेकिन कलम से, कोर्ट से, कोड से। संविधान हमारा सबसे बड़ा हथियार है, इसे पढ़ो।
बाबासाहेब ने कहा था, "मैं उस धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाए"। इसलिए उन्होंने हमें बुद्ध का रास्ता दिया: तर्क का, करुणा का, खुद दीपक बनने का।
आज शाम जब आप घर जाएं, तो अपने बच्चों से एक सवाल ज़रूर पूछना: "बी.आर. आंबेडकर कौन थे?" अगर बच्चा जवाब न दे पाए, तो समझना जयंती अधूरी रह गई।
आओ संकल्प लें कि अगले 14 अप्रैल तक हर घर में संविधान की एक प्रति होगी और हर हाथ में किताब।
क्योंकि बाबासाहेब मूर्ति में नहीं, हमारे मस्तिष्क में जिंदा रहते हैं। जब तक एक भी बच्चा "मैं क्या कर सकता हूँ" से "मैं क्यों नहीं कर सकता" तक का सफर तय करता रहेगा, तब तक बाबासाहेब अमर रहेंगे।
जय संविधान! जय भारत!
उक्त अवसर पर सुकृत रेंज के सभी अधिकारी कर्मचारी मौजूद थे,विमल चौहान,अखिलेश्वर दूबे,आलोक,आनंद,सतीश, संतोष,अंकित, तथा सुकृत गांव के ग्राम प्रधान मौजूद थे।