देवल, ब्यूरो चीफ,डाला, सोनभद्र। खनन क्षेत्र बिल्ली-मारकुंडी के निवासी इन दिनों धूल, प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन से गंभीर रूप से जूझ रहे हैं। क्षेत्र में लगभग 35 से अधिक खनन पट्टे संचालित हैं, जिनसे उड़ती धूल और भारी वाहनों की आवाजाही ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति हो रही है, जबकि जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा।
नियमों के अनुसार प्रत्येक खनन पट्टा धारक को क्षेत्र में नियमित मेडिकल कैम्प आयोजित कर प्रदूषण से प्रभावित लोगों की स्वास्थ्य जांच और उपचार की व्यवस्था करनी अनिवार्य है। बावजूद इसके, अब तक न तो समुचित मेडिकल कैम्प लगाए गए और न ही स्थायी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराई गई। ग्रामीणों का कहना है कि धूल के कारण दमा, एलर्जी, त्वचा रोग और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग और जिला प्रशासन मौन बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों की उदासीनता और जिला प्रशासन की चुप्पी के कारण खनन कंपनियां नियमों की खुलेआम अनदेखी कर रही हैं। प्रदेश सरकार की ओर से भी अब तक कोई ठोस हस्तक्षेप दिखाई नहीं दे रहा है। जबकि प्रदेश में खनन विभाग सीधे सूबे के मुखिया के अधीन है, फिर भी क्षेत्रीय अधिकारी निरंकुश और बेपरवाह नजर आ रहे हैं।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब शासन-प्रशासन उनकी बुनियादी स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो वे अपनी गुहार आखिर कहां लगाएं ?।
बिल्ली-मारकुंडी की जनता अब जवाब चाहती है कि क्या उन्हें स्वच्छ हवा और इलाज का अधिकार नहीं है। क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि तत्काल प्रभाव से नियमित मेडिकल कैम्प, स्थायी अस्पताल की स्थापना और प्रदूषण नियंत्रण के सख्त उपाय लागू किए जाएं, अन्यथा आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए वे बाध्य होंगे।
