पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत (INDIA) ने पाकिस्तान (PAKISTAN) पर 'वाटर स्ट्राइक' कर दी और सिंधु जल समझौता (Indus Water Treaty) को निलंबित तक दिया। यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों का बंटवारा करती है।
भारत ने जब से सिंधु जल समझौता को निलंबित किया है, तब से पाकिस्तान खुद को दुनिया की नजरों में बेचारा साबित करने पर तुला है और भारत पर पानी को हथियार बनाने का बेबुनियाद आरोप वैश्विक मंचों पर लगा रहा है, लेकिन तमाम कोशिशों को बावजूद भी पाकिस्तान की दाल गल नहीं रही है।
काम नहीं आई पाकिस्तान की चाल
पाकिस्तान के पहले से बने 'पब्लिक रिलेशंस सिस्टम' ने सिंधु जल संधि पर भारत के खिलाफ एक आक्रामक अभियान चलाया था, लेकिन एक्टपर्ट्स का कहना है कि उसे दुनिया के सामने भारत को बदनाम करने में कामयाबी नहीं मिलेगी।
सिंधु जल संधि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की कोशिश
पाकिस्तान, सिंधु जल समझौता (indus water treaty) के मुद्दे को जलवायु संकट के जोड़ते हुए इसका अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहता है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण जैसे तर्कों से वो अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहानुभूति हासिल करना चाहता है, वो भी ऐसे समय में जब पानी की सुरक्षा एक वैश्विक चिंता का विषय है।
दुनिया के गुमराह कर रहा पाकिस्तान
पाकिस्तान शुरू से ही खुद दुनिया के सामने बेचारा दिखाने की कोशिश कर रहा है। वह बार-बार भारत पर सिंधु बेसिन का पानी बंद करने का आरोप लगाता रहा है। 1952 में भी पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने UNSC में भारत पर आरोप लगाया था। 50 के दशक से अब तक पाकिस्तान पानी के मुद्दे पर वही राग अलाप रहा है।
पाकिस्तान सिंधु जल समझौता के तहत मिले अधिकारों को संप्रभु अधिकारों से मिलाकर दुनिया को गुमराह कर रहा है। पाकिस्तान दुनिया के सामने छिपाता है कि सिंधु जल संधि के कारण उसे पानी मिलता है, न कि उस पर उसका मालिकाना हक है।
क्या कहता है सिंधु जल समझौता?
सिंधु जल संधि (IWT) को गौर से देखें, तो यह पानी के इस्तेमाल के बंटवारे के बारे में है। संधि ने भारत के इलाके में बहने वाली नदियों पर भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता बनाए रखी है। वहीं पानी के इस्तेमाल से जुड़ी संधि आधारित जिम्मेदारियां तय की है। यह संधि दो संप्रभु देशों के बीच पानी के इस्तेमाल के खास प्रावधानों और प्रतिबंधों को नियंत्रित करती है।
भारत ने दिया कड़ा संदेश
सिंधु जल समझौता को स्थगित करके भारत ने पाकिस्तान के साथ ही दुनिया को कड़ा संदेश दिया है। इसका महत्व नदी के बहाल को बदलने में नहीं बल्कि एकतरफा संयम की उस नीति को खत्म करने में हैं, जिसकी वजह से भारत अपने अधिकारों का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर रहा था। वैसे भी किसी भी समझौते को सुचारू रूप से चलाने के लिए दोनों पक्षों की जरूरत होती है, और पाकिस्तान सदैव इसमें नाकाम रहा है।
