देवल संवाददाता, आजमगढ़।सामाजिक न्याय के समकालीन विमर्श को केंद्र में रखकर संपादित पुस्तक “सामाजिक न्याय के विमर्श में डॉ. बी. आर. अंबेडकर और वर्तमान परिस्थितियाँ” को डॉ. शफीउज़्ज़मां ने महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव कुमार को सप्रेम भेंट किया। इस अवसर पर कुलपति ने पुस्तक की सराहना करते हुए इसे सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
कुलपति प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित इस प्रकार की पुस्तकों से न केवल विद्यार्थियों बल्कि शोधार्थियों और शिक्षकों को भी नई दृष्टि मिलती है। उन्होंने संपादक को भविष्य में भी इसी प्रकार के गंभीर अकादमिक कार्य करते रहने के लिए प्रेरित किया।विदित हो कि इस पुस्तक का प्राक्कथन स्वयं कुलपति प्रो. संजीव कुमार द्वारा लिखा गया है, जिससे इसकी शैक्षणिक विश्वसनीयता और महत्व और भी बढ़ गया है। पुस्तक में सामाजिक न्याय के विविध आयामों—जैसे जातीय असमानता, मानवाधिकार, संवैधानिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्य, लैंगिक समानता तथा वंचित वर्गों के सशक्तिकरण—पर विद्वानों के शोधपरक लेख संकलित किए गए हैं। ये लेख न केवल सिद्धांतात्मक बल्कि व्यावहारिक दृष्टि से भी अंबेडकरवादी चिंतन को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
पुस्तक के संपादक डॉ. शफीउज़्ज़मां, जो शिबली नेशनल कॉलेज के राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष हैं, ने अपनी प्रस्तावना में एक रोचक ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि डॉ. भीमराव अंबेडकर के सहपाठी रहे फरुख शेयर आजमगढ़ के निवासी थे, जो उस समय London School of Economics में अध्ययनरत थे। संपादक ने यह भी उल्लेख किया कि लगभग 20 वर्ष पूर्व उनकी स्वयं फरुख शेयर से मुलाकात हुई थी, जिससे इस पुस्तक का संदर्भ और भी जीवंत तथा रोचक बन जाता है।
यह पुस्तक एक संपादित (Edited Volume) ग्रंथ है, जिसमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से जुड़े विद्वानों के लगभग दर्जनों शोध आलेख शामिल हैं। प्रत्येक अध्याय में डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों—विशेषकर सामाजिक न्याय, समता, बंधुत्व और विधिक अधिकारों—को आधुनिक भारतीय समाज, राजनीति और नीति-निर्माण के संदर्भ में विश्लेषित किया गया है।पुस्तक की भाषा सरल एवं अकादमिक संतुलन लिए हुए है, जिससे यह शोधार्थियों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों तथा सामाजिक विज्ञान के अध्येताओं के लिए समान रूप से उपयोगी बन जाती है। इसमें संदर्भ सूची (References), उद्धरण (Citations) और शोध-पद्धति का भी विशेष ध्यान रखा गया है, जिससे इसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है।
इसके अतिरिक्त, यह पुस्तक न केवल सैद्धांतिक विमर्श तक सीमित है, बल्कि वर्तमान सामाजिक चुनौतियों जैसे सामाजिक विषमता, शिक्षा में असमानता, आर्थिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन पर भी ठोस चर्चा प्रस्तुत करती है।
इस पुस्तक के माध्यम से न केवल अंबेडकर के विचारों को समकालीन संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है, बल्कि स्थानीय ऐतिहासिक जुड़ाव को भी रेखांकित किया गया है, जो इसे अन्य पुस्तकों से अलग बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पुस्तक सामाजिक न्याय के अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी और अकादमिक जगत में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में स्थापित होगी।