देवल, ब्यूरो चीफ,डाला, सोनभद्र। सरकार की महत्वाकांक्षी निषाद राज बोट योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। होली के बाद योजना के तहत 5 नांव लाभार्थियों के नाम वितरित की गईं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मौके पर ओबरा डैम के पास रेलवे लाइन के नीचे 3 नावें पाई गईं, जो पूरी तरह अधूरी हालत में हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार किसी नाव में पुरानी लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है तो किसी की फिनिशिंग तक पूरी नहीं की गई है। ऐसे में इन नांवों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जब इस संबंध में विभागीय अधिकारियों से जानकारी ली गई तो संबंधित इंस्पेक्टर ने बताया कि विभाग केवल भुगतान करता है, जबकि नांव लाभार्थियों द्वारा मंगाई गई है और फर्म ने उसे उपलब्ध कराया है। हालांकि इस जवाब से कई नए सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर अधूरी और निम्न गुणवत्ता की नावें कैसे मंगाई गईं और उनकी जांच किसने की। गौरतलब है कि इससे पहले भी 9 जनवरी को अधूरी और पुरानी नावें मंगाए जाने का मामला सामने आया था। उस समय खबर समाचार पत्रों में प्रकाशित होने के बाद प्रशासन ने संज्ञान लेते हुए जांच की बात कही थी। इसके बावजूद फिर से अधूरी नावें सामने आने से यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं कमीशनखोरी के चक्कर में सरकारी योजनाओं की गुणवत्ता से समझौता तो नहीं किया जा रहा है। स्थानीय लोगों और लाभार्थियों ने मांग की है कि जब तक नावें गुणवत्ता के मानकों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरतीं, तब तक उनका भुगतान रोका जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
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