कृष्ण, देवल ब्यूरो, अंबेडकर नगर ।इलाहाबाद के गदूपुर स्थित दारुल उलूम हनफ़िया क़ादरिया का सालाना जलसा-ए-दस्तारबंदी अत्यंत श्रद्धा, गरिमा और धार्मिक उत्साह के साथ आयोजित किया गया। यह पवित्र आयोजन इल्म, अमल और रूहानियत का सुंदर संगम रहा, जिसमें उलेमा-ए-किराम, हाफ़िज़-ए-क़ुरआन, छात्र, बुद्धिजीवी और बड़ी संख्या में आम लोग उपस्थित रहे।
इस भव्य जलसे की अध्यक्षता सूफ़ी विचारधारा के प्रचारक, शांति और प्रेम के संदेशवाहक डॉ. अल्लामा पीरज़ादा सैयद हसनैन मुहम्मदी सुहरवर्दी (सज्जादा नशीन ख़ानक़ाह सुहरवर्दिया चिश्तिया, इलाहाबाद) ने की। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने सूफ़िया-ए-किराम की शिक्षाओं, आपसी प्रेम, एकता और दीन की अहमियत पर विस्तार से प्रकाश डाला।
जलसे की सरपरस्ती क़ाइद-ए-अहले-सुन्नत, प्रिंसिपल दारुल उलूम हनफ़िया क़ादरिया, हज़रत अल्लामा हाफ़िज़ व क़ारी अली अख़्तर मिस्बाही ने की जिनकी देखरेख में यह संस्था निरंतर धार्मिक व शैक्षणिक सेवाएँ अंजाम दे रही है।
कार्यक्रम का सफल संचालन अल्लामा हाफ़िज़ व क़ारी मुहम्मद अशरफ़ बरकाती मिस्बाही के नेतृत्व में, हाफ़िज़ व क़ारी गुलाम मुस्तफ़ा (इमाम व ख़तीब, जामा मस्जिद गददोपुर) के सहयोग से और हाफ़िज़ व क़ारी अब्दुस्समद की विशेष निगरानी में सम्पन्न हुआ।
मुख्य वक्ता के रूप में अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वक्ता व उस्ताज़-उल-उलेमा हज़रत अल्लामा मसऊद अहमद बरकाती मिस्बाही (जामिया अशरफ़िया, मुबारकपुर, आज़मगढ़) ने क़ुरआन व सुन्नत की रोशनी में इल्म-ए-दीन की महानता, इख़लास और छात्रों व हाफ़िज़ों की ज़िम्मेदारियों पर प्रभावशाली संबोधन दिया। इसके अतिरिक्त मुफ्ती ग़ियासुद्दीन मिस्बाही (भदोही) और मुफ्ती फ़ैयाज़ अहमद बरकाती मिस्बाही (इलाहाबाद) ने भी सुधारात्मक व विचारोत्तेजक भाषण प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम की शुरुआत क़ारी मुहम्मद सिराज द्वारा पवित्र क़ुरआन की तिलावत से हुई। जलसे का संचालन मौलाना जमील अख़्तर ने अत्यंत सलीके और गरिमा के साथ किया। नातिया शायरी ने महफ़िल को आध्यात्मिक रंग प्रदान किया। शायरों में मज़हर रज़ा इलाहाबादी, क़ारी महबूब आलम, फ़िरदौस निज़ामी और मौलाना यासिर शामिल रहे।
जलसा-ए-दस्तारबंदी में सफल हाफ़िज़-ए-क़ुरआन की दस्तारबंदी की गई, जिनमें हाफ़िज़ मुहम्मद हम्माद, हाफ़िज़ मुहम्मद समीर, हाफ़िज़ अब्दुल हसीब, हाफ़िज़ मुहम्मद तौफ़ीक़, हाफ़िज़ मुहम्मद मसरूफ़, हाफ़िज़ मुहम्मद शमशाद और हाफ़िज़ मुहम्मद शौकत शामिल हैं। उलेमा ने उन्हें दुआओं से नवाज़ा और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
जलसे में बड़ी संख्या में उलेमा-ए-किराम और गणमान्य व्यक्तियों ने शिरकत की। विशेष रूप से सैयद मुहम्मद अदी, मौलाना मुहम्मद अफ़्फ़ान, मौलाना मुहम्मद मोनिस, हाफ़िज़ मुहम्मद सादिक़ मुस्तफ़ा, हाफ़िज़ मुहम्मद मुजीब, क़ारी मुहम्मद मज़म्मिल, मौलाना बिलाल अहमद, क़ारी हैदर रज़ा, मौलाना मुहम्मद याक़ूब, सूफ़ी अब्दुल मुबीन, मौलाना यूसुफ़, मौलाना क़ौनैन, क़ारी नूर मुजस्सम और मौलाना तजम्मुल हुसैन उल्लेखनीय रहे।
इसी तरह मदरसे की प्रबंध समिति के सदस्यों हाजी मुहम्मद सिद्दीक़ (उर्फ़ गांधी जी), हाजी मुहम्मद हबीब, हाजी मुहम्मद छुट्टन, सलाहुद्दीन, मुहम्मद फ़हद, मुहम्मद आक़िब, मुहम्मद अनवर, मुहम्मद बुद्धन, मुहम्मद सुहैल, मुहम्मद मुस्तक़ीम, मुहम्मद अशफ़ाक़, मुहम्मद अनस और मुहम्मद दानिश ने जलसे की तैयारी और उसकी सफलता में अहम भूमिका निभाई।
जलसे में आम लोगों की भी बड़ी संख्या मौजूद रही, जिनमें अब्दुल क़ादिर, मुहम्मद साहिल, मुहम्मद कैफ़, मुहम्मद शारिफ़, मुहम्मद नौशाद, मुहम्मद ज़ाहिद, मुहम्मद नासिर, सबीह अख़्तर, मुहम्मद अनीस, मुहम्मद असगर, मुहम्मद कबीर, मुहम्मद रेहान सहित अन्य अनेक लोग शामिल थे। सभी श्रोताओं ने पूरे ध्यान, अदब और श्रद्धा के साथ तक़रीरें सुनीं और जलसे को पूरी तरह सफल बनाया।
अंत में सामूहिक दुआ के साथ जलसे का समापन हुआ। यह आयोजन न केवल छात्रों और हाफ़िज़ों के लिए उत्साहवर्धक सिद्ध हुआ बल्कि समाज में धार्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों और रसूल-ए-अकरम से प्रेम को बढ़ावा देने का सशक्त माध्यम भी बना।