कृष्ण, देवल ब्यूरो, अंबेडकर नगर ।विकास खण्ड बसखारी की ग्राम पंचायत उमरापुर मीनापुर में निजी तालाब को जेसीबी से खुदवाकर मनरेगा से भुगतान कराने का मामला अब जोर पकड़ता जा रहा है। इस पूरे प्रकरण में एडीओ पंचायत उमाशंकर सिंह की जांच रिपोर्ट और अपलोड की गई तस्वीरें खुद ही सवाल खड़े कर रही हैं—और ग्रामीणों के गुस्से में घी डाल रही हैं। बताया जा रहा है कि जांच में जो फोटो लगाए गए हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो “जांच कम, फोटोशूट ज्यादा” हुआ हो। मनरेगा कार्यों में जहां लोकेशन की फोटो अनिवार्य होते हैं, वहीं यहां तस्वीरों में न तो लोकेशन का पता है और न ही तारीख का। ऊपर से, ग्रामीणों के हाथ में फावड़ा थमाकर फोटो खिंचवाए गए—जैसे कोई काम चल रहा हो। अब लोग तंज कस रहे हैं कि “काम जेसीबी से और मनरेगा मजदूरों नाम घोटाले बदबू!”
ग्रामीणों का आरोप है कि जब तालाब जेसीबी से खुदवाया गया, तो फिर मनरेगा मजदूरों की हाजिरी कैसे लग गई? उनका कहना है कि फर्जी मजदूर और फर्जी हाजिरी के जरिए मनरेगा में जमकर घोटाला किया गया है।
गांव में चर्चा है कि “जांच” के नाम पर सब कुछ पहले से तय रहता है—बस कागज और फोटो पूरे कर दिए जाते हैं। कुछ ग्रामीण तो यहां तक कह रहे हैं कि जब से एडीओ पंचायत उमाशंकर सिंह ने ब्लॉक में कदम रखा है, तब से “निस्तारण कम, व्यवस्थापन ज्यादा” चल रहा है—और वह भी कथित तौर पर कमीशन के साथ।
मामले में एपीओ और डीसी मनरेगा की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। ग्रामीण कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि “नींद इतनी गहरी है कि कुंभकरण भी शरमा जाए!” अब सवाल उठ रहा है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे मामले से अनजान हैं या जानकर भी अनदेखी कर रहे हैं? इधर, यह भी चर्चा में है कि एडीओ पंचायत उमाशंकर सिंह पर पहले भी आरोप लगे, उन्हें कार्रवाई के बजाय नए-नए चार्ज देकर नवाजा जा रहा है। ऐसे में लोग तंज कस रहे हैं—“यहां नियम नहीं, ‘नेटवर्क’ चलता है!”
फिलहाल बसखारी ब्लॉक इन दिनों भ्रष्टाचार की सुर्खियों में खूब फल-फूल रहा है। अब देखना यह होगा कि इस मामले में कोई उच्च स्तरीय जांच होती है या फिर फाइलों और फोटो के सहारे ही ‘सिस्टम’ चलता रहेगा।
