देवल संवाददाता, सामान्यत- मार्च का महीना बसंत ऋतु का प्रतीक माना जाता है। यह वह समय होता है जब न तो शीत ऋतु की तीव्रता शेष रहती है और न ही ग्रीष्म ऋतु की प्रबलता पूरी तरह अनुभव होती है। हल्की धूप, संतुलित तापमान और सुहावना मौसम इस महीने की प्रमुख विशेषताएँ मानी जाती हैं। किंतु इस वर्ष परिस्थितियाँ कुछ भिन्न दिखाई दे रही हैं। मार्च के शुरुआती दिनों में ही देश के कई हिस्सों में तापमान तेजी से बढ़ने लगा है और अनेक स्थानों पर लू जैसी परिस्थितियाँ बनने लगी हैं। यह स्थिति केवल सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि बदलते जलवायु स्वरूप की एक गंभीर चेतावनी के रूप में भी देखी जा सकती है। मौसम के पारंपरिक चक्र में आ रहा यह परिवर्तन पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसके सामाजिक तथा आर्थिक प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। हाल के मौसमीय आँकड़े इस असामान्य स्थिति की पुष्टि करते हैं। देश के कई शहरों में तापमान सामान्य से 8 से 13 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 7 मार्च को अधिकतम तापमान 35.7 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया, जो पिछले लगभग पचास वर्षों में मार्च के पहले सप्ताह का सबसे गर्म दिन माना गया। इसी प्रकार मुंबई के सांताक्रूज़ क्षेत्र में 10 मार्च को तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया, जो सामान्य से लगभग 7.6 डिग्री अधिक था। ये आँकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि इस वर्ष गर्मी का प्रभाव अपेक्षा से कहीं पहले और अधिक तीव्र रूप में दिखाई देने लगा है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार जब किसी क्षेत्र में अधिकतम तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री सेल्सियस तक अधिक हो जाता है, तो उसे लू की स्थिति माना जाता है, जबकि इससे अधिक वृद्धि होने पर गंभीर लू की स्थिति घोषित की जाती है। मार्च के प्रारंभिक दिनों में ही कई क्षेत्रों में तापमान का इस स्तर तक पहुँच जाना भविष्य के लिए चिंता का विषय है। मौसम विभाग ने पहले ही संकेत दिया है कि मार्च से मई के बीच देश के अधिकांश भागों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है, जिससे आने वाले महीनों में गर्मी और अधिक तीव्र रूप ले सकती है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस असामान्य गर्मी का एक प्रमुख कारण वातावरण में सक्रिय एंटीसाइक्लोनिक प्रणाली है। जब किसी क्षेत्र में ऐसी प्रणाली बनती है, तो वायुदाब बढ़ जाता है और वातावरण में शुष्कता अधिक हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप समुद्र से आने वाली ठंडी और आर्द्र हवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं तथा तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। गुजरात और उसके आसपास के क्षेत्रों में बने एंटीसाइक्लोनिक सर्कुलेशन के कारण शुष्क हवाएँ प्रभावी हो गई हैं, जिससे तापमान पर प्राकृतिक नियंत्रण कम हो गया है। इसके अतिरिक्त इस समय कोई प्रभावी पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं है, जो सामान्यतः उत्तर भारत के तापमान को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस असामान्य गर्मी का प्रभाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्पष्ट रूप से महसूस किया जा रहा है। उत्तर भारत के अनेक हिस्सों के साथ-साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी इसका असर दिखाई दे रहा है। आजमगढ़ और पूरे पूर्वांचल क्षेत्र में मार्च के शुरुआती दिनों में ही तेज धूप और असहज गर्मी का अनुभव होने लगा है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों के लिए दोपहर का समय कठिन होता जा रहा है। गर्मी के कारण खेतों में काम की अवधि कम करनी पड़ रही है, जिससे कृषि कार्यों की गति प्रभावित होने की आशंका है। इसके साथ ही बढ़ते तापमान के कारण जल स्रोतों पर दबाव भी बढ़ने लगता है, क्योंकि पानी की खपत तेजी से बढ़ जाती है। बढ़ती गर्मी का प्रभाव विद्यार्थियों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मार्च और अप्रैल का समय विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में वार्षिक परीक्षाओं का होता है। इस दौरान छात्रों को नियमित रूप से विद्यालय या परीक्षा केंद्र जाना पड़ता है। अत्यधिक गर्मी के कारण उन्हें शारीरिक थकान, निर्जलीकरण तथा एकाग्रता में कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कई विद्यालयों में पर्याप्त शीतलन व्यवस्था न होने के कारण विद्यार्थियों को असुविधा होती है, जबकि दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्रों को दोपहर की तेज धूप में यात्रा करनी पड़ती है। बढ़ती गर्मी का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग वातानुकूलित सुविधाओं के माध्यम से इससे कुछ हद तक बचाव कर लेता है, जबकि गरीब और श्रमिक वर्ग को खुले वातावरण में ही कार्य करना पड़ता है। निर्माण कार्यों में लगे मजदूर, खेतों में काम करने वाले किसान, रिक्शा या ठेला चलाने वाले श्रमिक तथा दिहाड़ी मजदूरों के लिए तेज गर्मी सीधे उनके स्वास्थ्य और आजीविका दोनों को प्रभावित करती है। झुग्गी-झोपड़ी या कच्चे घरों में रहने वाले परिवारों के पास पर्याप्त ठंडक और स्वच्छ पेयजल की सुविधा भी सीमित होती है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक दुष्प्रभाव समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ता है।
वास्तव में यह समस्या केवल एक वर्ष की नहीं है। पिछले कुछ दशकों में वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आए हैं। औद्योगिकीकरण, तीव्र शहरीकरण, वनों की कटाई और जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप मौसम के पारंपरिक चक्र में परिवर्तन दिखाई देने लगा है और गर्मी का प्रभाव पहले की अपेक्षा अधिक जल्दी और तीव्रता के साथ महसूस होने लगा है। ऐसी परिस्थितियों में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु संतुलन को गंभीरता से लेना आवश्यक है। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग तथा शहरी क्षेत्रों में हरित क्षेत्र बढ़ाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। साथ ही शैक्षणिक संस्थानों और प्रशासन को भी बढ़ती गर्मी को ध्यान में रखते हुए आवश्यक व्यवस्थाएँ करनी चाहिए। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में ऐसी असामान्य गर्मी सामान्य स्थिति बन सकती
है। इसलिए यह समय चेतने और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और संतुलित भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।