पश्चिम एशिया में तेजी से बिगड़ते हालात के बीच गुरुवार देर रात इजरायल द्वारा ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर किया गया हमला केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा भू-राजनीति में बड़ा झटका माना जा रहा है।
दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार साउथ पार्स पर हमले के बाद जहां ईरान की ऊर्जा क्षमता प्रभावित हुई है, वहीं इसका सीधा असर वैश्विक तेल-गैस बाजार और भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ना तय है। इस हमले के बाद ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है, जिससे पूरा पश्चिम एशिया एक व्यापक ऊर्जा संघर्ष के मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है।
भारत के लिए था खास
पाठकों को जान कर यह अचरच होगा कि ईरान साउथ पार्स वही गैस फील्ड है, जिस पर भारत की नजर अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए चार दशकों से टिकी हुई थी और 2000 के दशक में भारत की सरकारी व निजी कंपनियों ने पार्स में निवेश करने को लेकर ना सिर्फ भारी-भरकम योजनाएं बनाएं थी बल्कि भारत व ईरान की सरकारों के बीच समझौता भी हुआ था।
3 अरब डॉलर का निवेश
वर्ष 2004 में आईओसी ने करीब 3 अरब डॉलर की डील साइन की थी, जिसमें गैस उत्पादन, एलएनजी प्लांट और निर्यात शामिल था। वर्ष 2009 में ओएनजीसी को साउथ पार्स के फेज-12 में 20 फीसद हिस्सेदारी की पेशकश हुई थी। यह योजना जमीन पर लागू होती तो ओएनजीसी का विदेश में सबसे बड़ा निवेश होता और विदेश में भारत की सबसे बड़ा ऊर्जा भंडार होता।
रूस की सखालीन से भी बड़ा। इसके समानांतर, पार्स तेल फील्ड से महज 250 किलोमीटर दूर फरजाद-बी गैस ब्लॉक में ओएजनीसी की अगुवाई वाली कंसोर्टियम ने 2008 में बड़ी गैस खोज की थी, जहां चरणबद्ध तरीके से पांच से 11 अरब डॉलर तक की निवेश की योजना थी।
वर्ष 2007 में भारत और ईरान के पेट्रोलियम मंत्रालयों के बीच हुई बैठक में अगले दो वर्षों के भीतर ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन पर काम शुरू करने की बात कही गई थी। दोनों देशों की सरकारों के बीच भारतीय कंपनियों की मदद से एलएनजी टर्मिनल बनाने पर सहमति बनी थी।
वर्ष 2008 में जब पाकिस्तान ने मुंबई आतंकी हमला करवाया तो उसके बाद भी गैस पाइपलाइन (समुद्र के भीतर-अंडर सी पाइपलाइन) पर बात ईरान व भारत के बीच जारी रही थी। इन सभी परियोजनाओं का आधार साउथ पार्स गैस था। ईरान सरकार भी भारत के साथ दीर्घकालिक ऊर्जा साझेदारी के पक्ष में थी।
अमेरिकी प्रतिबंध ने तोड़ी कमर
यह पूरी रणनीति अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण धीरे-धीरे धराशायी हो गई। 2018 में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ईरान न्यूक्लियर समझौते (जेसीपीओए) को खारिज कर दिया। ईरान में कारोबार के लिए सभी तरह के वित्तीय व प्रौद्योगिकी ट्रांसफर को प्रतिबंधित कर दिया। इन वजहों से भारतीय कंपनियां निवेश नहीं कर सकीं।
आखिरकार 2021 में ईरान ने फरजाद-बी का विकास कॉन्ट्रैक्ट अपनी घरेलू कंपनी को दे दिया, जिससे भारत बाहर हो गया। सनद रहे कि अमेरिकी प्रतिबंध की वजह से ईरान में भारत की सबसे महत्वाकांक्षी योजना चाबहार पोर्ट निर्माण से भी तकरीबन बाहर निकल चुका है।
चाबहार पोर्ट पर भारत का निवेश
चाबहार पोर्ट में भारत अभी तक तकरीबन 1200 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंध की वजह से अब भारत के लिए वहां संचालन करना मुश्किल हो गया है जबकि वर्ष 2024 में ही भारत व ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के संचालन का काम भारतीय कंपनियों को 10 वर्ष के लिए और देने का समझौता हुआ था।
साफ है कि साउथ पार्स पर हमला केवल ईरान या इजरायल के बीच संघर्ष का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह भारत के लिए एक 'रणनीतिक रिमाइंडर' है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि एक व्यापक भू-राजनीतिक मसला है।ओएनजीसी विदेश, इंडियन आयल व ऑयल इंडिया जैसी कंपनियों ने साउथ पार्स के विभिन्न फेज में निवेश की आक्रामक योजनाएं बनाई थीं। उस दौर में ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था और दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग तेजी से बढ़ रहा था।