अमेरिका ने अपनी नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति (NDS 2026) जारी की है, जिसमें चीन को अब सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती नहीं माना गया है। यह रणनीति अमेरिकी रक्षा विभाग पैंटागन ने तैयार की है। नई नीति में ताइवान का सीधा उल्लेख नहीं किया गया है और चीन से सीधे सैन्य टकराव से बचने पर जोर दिया गया है।
रणनीति के अनुसार, अगर चीन ताइवान पर हमला करता है तो अमेरिकी सेना सीधे युद्ध में शामिल नहीं होगी। अमेरिका हथियार, प्रशिक्षण और रणनीतिक सहयोग दे सकता है, लेकिन सीधा सैन्य हस्तक्षेप करने का वादा नहीं करता। इससे ताइवान को लेकर अमेरिका की नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
पेंटागन ने अपनी नई नीति को 'शक्ति से रोकना, टकराव से नहीं' बताया है। यानी अमेरिका चीन को संतुलित करने की कोशिश करेगा, लेकिन सीधे संघर्ष से बचेगा। इंडो-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखना अब भी उसका लक्ष्य रहेगा।
मातृभूमि पर फोकस
नई रणनीति में अमेरिका ने अपनी प्राथमिकताएं साफ की हैं। सबसे पहले मातृभूमि और आसपास के इलाकों की सुरक्षा पर ध्यान दिया जाएगा। दस्तावेज में चार मुख्य प्राथमिकताएं बताई गई हैं
मातृभूमि की रक्षा
सहयोगियों को अधिक आत्मनिर्भर बनाना
रक्षा उद्योग को मजबूत करना
चीन को रोकना
अमेरिका ने कुछ रणनीतिक क्षेत्रों तक सैन्य और व्यापारिक पहुंच बनाए रखने की बात भी कही है, जैसे ग्रीनलैंड। उत्तरी अमेरिका के लिए मिसाइल रक्षा प्रणाली को मजबूत करने की भी योजना है। यूरोप और एशिया के सहयोगी देशों से कहा गया है कि वे अपनी सुरक्षा और रक्षा बजट बढ़ाएं। अब अमेरिका अपने सहयोगियों पर कम और अपने हितों की रक्षा पर ज्यादा ध्यान देगा।
ताइवान नीति में बड़ा बदलाव
ताइवान को लेकर यह रुख पहले की नीति से अलग है। 2022 में जारी रक्षा रणनीति जो जो बाइडन प्रशासन के दौरान बनी थी, उसमें ताइवान की रक्षा के लिए स्पष्ट समर्थन दिया गया था। उस समय अमेरिका ने कहा था कि वह चीन के संभावित हमले की स्थिति में ताइवान की 'असमान रक्षा' का समर्थन करेगा।
उस नीति से ताइवान को यह भरोसा मिलता था कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका सीधे सैन्य समर्थन देगा। लेकिन नई रणनीति में ऐसा कोई स्पष्ट वादा नहीं है। अब अमेरिका की रणनीति यह है कि वह क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर शक्ति संतुलन बनाए रखे और चीन को हावी होने से रोके, लेकिन सीधे युद्ध में न उतरे।