आमिर, देवल ब्यूरो ,मानीकलां, जौनपुर (उत्तरशक्ति)। खेतासराय थाना क्षेत्र के मानीकलां निवासी मदरसा कुरानिया जामा मस्जिद के नाजिम व इमाम हाफ़िज़ रियाज़ अहमद खान का शनिवार देर रात इंतकाल हो गया। उनके अचानक निधन की खबर से पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। लोगों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि समाज और दीनी तालीम के लिए जीवन समर्पित करने वाला यह शख्स अब उनके बीच नहीं रहा।
रविवार को उनके जनाजे में हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। जनाजे से लेकर सुपुर्द-ए-खाक तक मिट्टी देने वालों का तांता लगा रहा। परिवार के लोग, चाहने वाले, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे।
हाफ़िज़ रियाज़ अहमद खान लंबे समय से मदरसा कुरानिया जामा मस्जिद से जुड़े हुए थे। वे अपने नाना, मानीकलां बड़ी जामा मस्जिद के तीसरे इमाम मौलाना अमीनुद्दीन के दौर से ही मस्जिद और मदरसे के तामीरी व तालीमी कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़े रहे। लगभग 40 वर्षों तक उन्होंने मस्जिद और मदरसे की सेवा की। वर्ष 2001 से वे नियमित रूप से मस्जिद की इमामत कर रहे थे और ईद-उल-फितर, ईद-उल-अजहा की नमाज के साथ-साथ निकाह और जनाजे जैसे धार्मिक कार्यों को पूरी जिम्मेदारी और लगन से निभाते रहे।
उन्होंने अपने जीवनकाल में अपने बच्चों को भी दीन की खिदमत में लगा दिया था। आज उनके तीनों बेटे उनके पदचिन्हों पर चलते हुए पांचों वक्त की नमाज, जुमे की नमाज, ईद की नमाज, निकाह, जनाजा और मस्जिद-मदरसे के तामीरी कार्यों को संभाल रहे हैं। इसके साथ ही वे हिफ्ज़ और कक्षा एक से पांच तक हिन्दी, उर्दू, अरबी और अंग्रेजी की तालीम का काम भी आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे गांव की शिक्षा की परंपरा कायम रहे।
हाफ़िज़ रियाज़ अहमद खान की एक बड़ी ख्वाहिश थी कि मानीकलां गांव में बच्चियों की तालीम के लिए एक अलग स्कूल स्थापित हो, ताकि जो बेटियां किसी कारणवश बाहर पढ़ने नहीं जा पातीं, उन्हें गांव में ही शिक्षा मिल सके। उन्होंने अपने जीवनकाल में इस काम की शुरुआत भी कर दी थी। मानीकलां एजेंसी चौराहा पर “जामिया रियाजुस सालेहात (लिल बनात)” नाम से इसका निर्माण कार्य चल रहा है। अब उनके बच्चे इस अधूरे सपने को पूरा करने के लिए प्रयासरत हैं।
मानीकलां कस्बा भले ही इतिहास की किताबों में ज्यादा दर्ज न हो, लेकिन यहां की पहचान शिक्षा और दीनी परंपरा से जुड़ी रही है। यहां वर्षों से बिना किसी फीस के काबिल और जिम्मेदार उस्तादों की देखरेख में बच्चों को बुनियादी धार्मिक शिक्षा दी जाती रही है। इस गांव की मिट्टी ने कई बड़े विद्वानों को जन्म दिया, जिनके असर से यहां पढ़ाई-लिखाई की परंपरा मजबूत बनी रही।
गांव में बच्चों को कुरान की तालीम देना हमेशा गर्व की बात मानी जाती रही है और यहां के लोग शिक्षकों का विशेष सम्मान करते हैं। गांव के बुजुर्ग हमेशा ऐसे काबिल लोगों को यहां लाकर बसाते रहे, ताकि वे पूरी लगन से नई पीढ़ी को तालीम दे सकें।
हाफ़िज़ रियाज़ अहमद खान ने इसी परंपरा को न सिर्फ संभाला, बल्कि इसे आगे बढ़ाने का काम किया। उन्होंने खामोशी और निरंतर मेहनत से ऐसा माहौल तैयार किया कि गांव का कोई भी बच्चा बुनियादी धार्मिक शिक्षा से महरूम न रहे। मानीकलां के हजारों लोगों ने उनकी देखरेख में पढ़ना-लिखना सीखा, कुरान याद किया और जीवन के सही रास्ते को पहचाना।
वे भले ही बड़े-बड़े खिताबों या शोहरत से दूर रहे, लेकिन उनके काम ने गांव की कई पीढ़ियों को रोशन किया। उनकी सादगी, सेवा और समर्पण ने उन्हें लोगों के दिलों में एक खास और स्थायी जगह दिला दी। उनके निधन से मानीकलां की तालीमी और दीनी परंपरा को गहरा आघात पहुंचा है, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाती रहेगी।