अंतरिक्ष अब तेजी से भीड़भाड़ वाला क्षेत्र बनता जा रहा है और यह स्थिति दुनिया भर की स्पेस एजेंसियों के लिए चिंता का कारण बन गई है। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अपनी इंडियन स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस रिपोर्ट-2025 में इस खतरे को विस्तार से बताया है।
इसरो के कुल 53 ऑपरेशनल सैटेलाइट्स पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं। इनमें 22 सैटेलाइट्स लो अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी से लगभग 500-1000 किमी की ऊंचाई पर हैं, जबकि 31 सैटेलाइट्स जियोसिंक्रोनस अर्थ ऑर्बिट यानी लगभग 36,000 किमी की ऊंचाई पर मौजूद हैं।
लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात सैटेलाइट्स मुख्य रूप से पृथ्वी की इमेजिंग और वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए उपयोग होते हैं, जबकि जियोसिंक्रोनस अर्थ ऑर्बिट में मौजूद सैटेलाइट्स मौसम, संचार और नेविगेशन सेवाओं के लिए अहम भूमिका निभाते हैं।
1.5 लाख से ज्यादा क्लोज एप्रोच अलर्ट
ISSAR-2025 के मुताबिक, लो अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट्स की संख्या तेजी से बढ़ने और स्पेस डेब्रिस के बढ़ते खतरे के कारण स्थिति चिंताजनक हो गई है। यूएस स्पेस कमांड के कॉम्बाइंड स्पेस ऑपरेशंस सेंटर ने 2025 में करीब 1.5 लाख क्लोज एप्रोच अलर्ट जारी किए। ये अलर्ट तब दिए जाते हैं जब सैटेलाइट और अंतरिक्ष मलबा खतरनाक रूप से करीब आ जाते हैं।
स्पेस में मलबा और सैटेलाइट लगभग 28,000 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से घूमते हैं, जिससे छोटे से टुकड़े की टक्कर भी बड़े हादसे में बदल सकती है।
18 बार करना पड़ा कोलिजन अवॉइडेंस मैन्यूवर
इन अलर्ट्स के आधार पर इसरो को 2025 में कुल 18 बार कोलिजन अवॉइडेंस मैन्यूवर (CAM) करना पड़ा। इनमें 14 मैन्यूवर लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट्स के लिए और 4 जियोसिंक्रोनस अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट्स के लिए किए गए। इस दौरान $1.2 बिलियन का NISAR सैटेलाइट भी शामिल रहा, जिसे संभावित टक्कर से बचाने के लिए ऑर्बिट बदली गई।
कोलिजन अवॉइडेंस मैन्यूवर के तहत सैटेलाइट अपने थ्रस्टर्स का इस्तेमाल कर अपनी कक्षा और गति में बदलाव करता है, ताकि टकराव से बचा जा सके। सैटेलाइट्स में सीमित मात्रा में ईंधन होता है। हर बार ऑर्बिट बदलने या मैन्यूवर करने में यह ईंधन खर्च होता है। इसरो के अनुसार, जब सैटेलाइट का ईंधन खत्म हो जाता है, तो वह निष्क्रिय हो जाता है। इसलिए हर अतिरिक्त मैन्यूवर सैटेलाइट की उम्र को कम करता है।
लॉन्चिंग तक टालनी पड़ी
इसरो को 2025 में अपने सभी 5 लॉन्च के लिए लिफ्ट-ऑफ से पहले कोलिजन अवॉइडेंस एनालिसिस करना पड़ा। एक मामले में LVM3-M6 मिशन की लॉन्चिंग को 41 सेकंड तक टालना पड़ा, ताकि अंतरिक्ष मलबे से सुरक्षित दूरी सुनिश्चित की जा सके।
चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर के लिए 2025 में 16 ऑर्बिट मैन्यूवर किए गए। गहरे अंतरिक्ष में दो बार इसकी ऑर्बिट प्लानिंग बदली गई, ताकि चंद्र टोही ऑर्बिटर से टकराव का खतरा टाला जा सके। कुल मिलाकर, भविष्य के जोखिम को देखते हुए इसरो को 84 बार अपनी ऑर्बिट प्लानिंग में बदलाव करना पड़ा।
अंतरिक्ष बनता जा रहा कचरे का डिब्बा
ISSAR-2025 और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरिक्ष तेजी से कचरे का डिब्बा बनता जा रहा है। वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक, अंतरिक्ष में 10 सेंटीमीटर से बड़े करीब 40,000 मलबे और 1 सेंटीमीटर से बड़े लगभग 12 लाख टुकड़े मौजूद हैं। 2025 में कुल 328 लॉन्च प्रयास हुए, जिनसे 4,198 सैटेलाइट्स तैनात किए गए और 4,651 नए स्पेस ऑब्जेक्ट्स जुड़े।
SpaceX के स्टारलिंक प्रोजेक्ट के तहत 10,749 सैटेलाइट्स में से 9,396 अब भी कक्षा में हैं, जबकि 1,353 पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश कर चुके हैं। इसके अलावा Hulianwang Digui, Kuiper और USA-NRO जैसी परियोजनाओं ने भी 2025 में सैकड़ों सैटेलाइट लॉन्च किए।
नेत्र प्रोजेक्ट से बढ़ेगी भारत की ताकत
भारत नेत्र प्रोजेक्ट के जरिए अपनी स्वदेशी ट्रैकिंग क्षमता को मजबूत कर रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत 10 सेंटीमीटर तक के मलबे की निगरानी संभव होगी। इसके साथ ही सैटेलाइट्स में अतिरिक्त ईंधन रखने और मिशन के अंत में उन्हें डी-ऑर्बिट करने की योजना बनाई जा रही है।
अमेरिका उन्नत रडार नेटवर्क के जरिए 40,000 से ज्यादा मलबों की रियल-टाइम ट्रैकिंग कर रहा है और स्वायत्त सैटेलाइट सुरक्षा प्रणालियों पर काम कर रहा है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी अत्याधुनिक कोलिजन अवॉइडेंस सॉफ्टवेयर विकसित कर रही है और 2030 तक मलबा हटाने वाले रोबोटिक सिस्टम तैनात करने की योजना है। चीन ऑन-ऑर्बिट रीफ्यूलिंग और लेजर आधारित तकनीकों पर काम कर रहा है, जो मलबे को नष्ट या उसकी दिशा बदल सके।
जापान निजी कंपनियों के साथ मिलकर चुंबकीय और इलेक्ट्रोडायनामिक तकनीकों से मलबे को वापस पृथ्वी के वातावरण में लाने के प्रयोग कर रहा है। स्पेस डेब्रिस और बढ़ती सैटेलाइट संख्या आने वाले समय में अंतरिक्ष संचालन को और जटिल बना सकती है।
