आमिर, देवल ब्यूरो ,जौनपुर।“ज़िंदगी तो सस्ती है, बस उसे गुज़ारने के तरीके महंगे हो गए हैं।” यह पंक्ति आज के सामाजिक परिवेश का सबसे सटीक चित्रण करती प्रतीत होती है। वास्तव में जीवन न तो पहले महंगा था और न ही आज है, बल्कि हमारी सोच, हमारी अपेक्षाएँ और दूसरों से तुलना करने की प्रवृत्ति ने इसे जटिल और महंगा बना दिया है।
आज का दौर प्रदर्शन का दौर बन गया है। लोग जीने से ज्यादा दिखाने में व्यस्त हैं। महंगे कपड़े, बड़ी गाड़ियाँ, आलीशान घर और नए-नए गैजेट्स मानो सफलता के पैमाने बन गए हैं। जबकि सच्चाई यह है कि जीवन को चलाने के लिए न तो अत्यधिक साधनों की आवश्यकता है और न ही चमक-दमक की। जीवन चलता है साँसों से, अच्छे स्वास्थ्य से, सच्चे संबंधों से और संतोष से — और ये चारों आज भी बिना किसी कीमत के उपलब्ध हैं।
समस्या तब शुरू होती है जब सादगी को कमज़ोरी और संतोष को असफलता समझ लिया जाता है। ठहराव को पीछे रह जाना माना जाता है। पड़ोसी की नई कार, रिश्तेदार की विदेश यात्रा और मित्र की ऊँची आय — ये सब तुलना की आग को हवा देते हैं। यहीं से जीवन की वास्तविक महंगाई शुरू होती है।
दिखावे की यह होड़ व्यक्ति को उस चीज़ को पाने के लिए प्रेरित करती है, जिसकी शायद उसे वास्तविक आवश्यकता ही नहीं होती। जरूरतें सीमित होती हैं, लेकिन इच्छाएँ असीमित। और यही असीमित इच्छाएँ जीवन को तनाव, ईर्ष्या और बेचैनी से भर देती हैं।
आज व्यक्ति समय को पैसे से तौलने लगा है। वह अधिक कमाने की चाह में अपनों के लिए समय निकालना भूल रहा है। जबकि सुबह की एक शांत चाय, माँ की मुस्कान, पिता का आशीर्वाद और बच्चों की हँसी — यही जीवन की असली दौलत है। इन पर कोई ईएमआई नहीं होती, न ही कोई किस्त चुकानी पड़ती है।
रात को सुकून की नींद आ जाए, मन में संतोष हो, तो वही सच्ची अमीरी है। असली महंगाई पैसे की नहीं, बल्कि तनाव, अकेलेपन और दिखावे की मजबूरी की है, जो इंसान को भीतर से खोखला कर देती है।
निष्कर्षतः, ज़िंदगी आज भी उतनी ही सरल और सस्ती है, जितनी पहले थी। फर्क सिर्फ इतना है कि हमने जीने के बजाय खुद को साबित करने की होड़ शुरू कर दी है। यदि हम थोड़ा कम दिखाएँ, थोड़ा अधिक महसूस करें और अपने भीतर झांकने की आदत डालें, तो एहसास होगा कि जीवन की सच्ची खुशियाँ सरलता में ही छिपी हैं।
वास्तव में ज़िंदगी सस्ती है — महंगे तो हमने उसे जीने के तरीके बना लिए हैं।